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शीर्षक
प्रतिलिपि
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फो राज्य के महामहिम बुद्ध राजा को

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प्रेम के बुद्ध सम्राट चाहते हैं कि आप फ़ो, एफ़-ओ, नामक साम्राज्य के बुद्ध सम्राट को, के-ओ, से बात करें। “फ़ो” का अर्थ है “जीवन।” आपका अभिनंदन, इस पृथ्वी से पाँच ज़िलियन से भी अधिक प्रकाश-वर्ष दूर से आए महामहिम बुद्ध सम्राट को। हम आपसे प्रेम करते हैं। यात्रा बहुत लंबी रही होगी। आशा है, आप स्वस्थ होंगे हैं। यहाँ पहुँचने के बाद क्या आप स्वस्थ हैं? “हाँ।” क्या यहाँ का वातावरण आपको किसी तरह परेशान कर रहा है? “नहीं, नहीं। हमारे पास अपनी सुरक्षा के उपकरण हैं।” बुद्ध सम्राट को और आपके अनुचरों का पृथ्वी ग्रह पर स्वागत है। आप यहाँ कितने समय तक रहेंगे? “आठ दिन।” आशा है, इस ग्रह पर रहने के दौरान आप स्वस्थ रहेंगे।

क्या आप हमसे कुछ सांझा करना चाहेंगे? “हाँ, अवश्य। विशेष अंतरिक्ष यान से फ़ो लोक से पृथ्वी ग्रह तक की यात्रा में सात महीने और पाँच दिन लगे।” वैसे, महोदय, क्या वह उन रहस्यमय यूएफ़ओ जैसा है, जो आते-जाते रहते हैं? क्या वह उन्हीं में से किसी जैसा दिखता है? हाँ? वाह। महोदय, वह गोल है, सिगार के आकार का, या चौकोर आकार, या त्रिकोणाकार? उसका आकार कैसा है? “गोलाकार।” और इस यूएफ़ओ में कितने लोग यात्रा कर सकते हैं? “आठ।” धन्यवाद, महोदय। यह सचमुच बहुत रोचक है।

फ़ो लोक में आपकी प्रजा, आपके लोग... वह बुद्ध लोक, यानी स्वर्ग जैसा है, है न, महोदय? “हाँ, ऐसा ही है।” क्या वहाँ भी हमारी तरह हर प्रकार के फल, पेड़ और सब्ज़ियाँ हैं? नहीं? तो वहाँ का प्राकृतिक दृश्य कैसा है? “वहाँ हर प्रकार के पेड़, पर्वत और नदियों से सजे सुंदर दृश्य हैं, लेकिन वे इतने दीप्तिमान और सुंदर हैं कि यहाँ के पर्वतों, नदियों, पेड़ों या दृश्यों जैसे नहीं हैं। वे कहीं अधिक सुंदर हैं। वे एक प्रकार से अलौकिक हैं। क्या आपके लोक में पशु-जन हैं? “नहीं, नहीं।”

आपके लोक, आपके दिव्य लोक के लोग क्या हमारे जैसे दिखते हैं? “नहीं। वे भौतिक नहीं हैं। वे भौतिक रूप धारण कर सकते हैं, लेकिन सामान्यतः भौतिक नहीं होते। वे सुंदर, लंबे और दिव्य-स्वरूप वाले लोग हैं। अभौतिक रूप में भी, यदि किसी के पास दिव्य दृष्टि हो, तो वह उन्हें दिव्य वस्त्रों में, सुंदर बालों, सुंदर आँखों और सुंदर मुखाकृति के साथ देख सकता है।” धन्यवाद, महोदय। ओह, ठीक है। क्षमा कीजिए, मेरे लोगों की ओर से मेरे बहुत-से प्रश्न हैं। वहाँ न होते हुए भी मुझे कुछ-कुछ ज्ञात है कि वह कैसा है। मुझे कुछ अनुमान है, लेकिन ये सभी प्रश्न पृथ्वीवासियों के लिए हैं। धैर्य रखने के लिए धन्यवाद, महोदय।

अब क्या आप कृपया बताएँगे कि हमारी इस साधारण-सी पृथ्वी पर आपकी पावन यात्रा का उद्देश्य क्या है? “हाँ। पहला उद्देश्य आपको और इस ग्रह के सभी लोगों को उस भीषणतम युद्ध से बच निकलने पर बधाई देना है, जो हो सकता था। वह युद्ध आपके अब तक ज्ञात सभी युद्धों से भी अधिक विनाशकारी हो सकता था। और सम्राटों के सम्राटों के सम्राटों के सम्राट को एक उपहार भेंट करना भी हमारा उद्देश्य है। यह उपहार हमारे लोक की ओर से आपके लिए दिव्य जीवन है।” ओह, केवल मेरे लिए? इस ग्रह के लोगों के लिए नहीं? “नहीं, नहीं, क्योंकि इसे ग्रहण करने के लिए उनके पास पर्याप्त पुण्य नहीं है।” हाँ, क्षमा कीजिए, मैं समझती हूँ। लेकिन यदि कुछ मनुष्य सचमुच आपके लोक के निवासियों जैसा दिव्य जीवन पाना चाहते हों, तो क्या प्रार्थना, विनती, अनुरोध, तपस्या या किसी प्रकार के ध्यान से वे इसे प्राप्त कर सकते हैं? क्या यह संभव है? “नहीं, यह संभव नहीं है।”

क्या आप इसका कारण बता सकते हैं? “हाँ। क्योंकि पहली बात तो यह है कि मनुष्य में इस विषय में सोचने जितनी भी इच्छाशक्ति नहीं है, और अनादि काल से इस संसार के दूषित होने के कारण उनकी प्रार्थनाएँ भी पूरी तरह निष्कपट नहीं हो सकतीं।” ओह, क्षमा कीजिए। यह सुनकर मुझे दुख हुआ। “और सम्राटों के सम्राटों के सम्राटों के सम्राट, हमारे बीच की दूरी भी इतनी अधिक है कि वे हम तक पहुँच ही नहीं सकते।” ओह, हाँ, मैं समझती हूँ। लेकिन हमें देखने आने और अपनी शक्ति से कुछ आशीष लाने के लिए आपका धन्यवाद। हम परमेश्वर और इस ग्रह की विनम्र मानवता की ओर से प्रेम और सम्मान सहित आपका अभिनंदन करते हैं, जब आप लौटें, तो कृपया हमारा अभिवादन और प्रेम अपनी प्रजा तक पहुँचाएँ।

वैसे, क्या आपके आशीर्वाद से आपके लोक के लोग सदा जीवित रहते हैं? “हाँ, वे सदा आनंद, परम सुख, विवेक और सुख-सुविधा से रहते हैं।” वाह, यह बहुत अच्छा है, सचमुच बहुत अच्छा। काश, इस ग्रह के लोग भी ऐसी विशेष और पवित्र जीवनशैली को जान पाते। तो बुद्ध सम्राट, यदि आपकी कृपा से मुझे दिव्य जीवन का यह दर्जा मिलता है, तो क्या मेरी कभी मृत्यु नहीं होगी? क्या मैं सदा जीवित रहूँगी? चाहे मैं कहीं भी रहूँ? हाँ? “बिल्कुल, बिल्कुल।” वाह, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

महामहिम, मैं इस ग्रह पर सदा जीवित रहना नहीं चाहूँगी, क्योंकि भौतिक शरीर आपके बुद्ध लोक जैसा शुद्ध और सुखद नहीं है। इसलिए शरीर के साथ छोड़ने तक मैं यथासंभव जीवित रहूँगी। मुझे कोई आपत्ति नहीं। मुझे अपने असली घर लौटने में कोई आपत्ति नहीं। मैं जन्म-जन्मांतर से, अनेक जीवनों से इस संसार की सेवा करती आई हूँ। अब अपने असली घर लौटने का समय आ गया है। मेरा अर्थ है कि आत्मा स्वतंत्र होकर आत्मिक जीवन का आनंद ले और उसे भौतिक, कर्मों व प्रतिफलों के भारी बोझ और उनसे जुड़ी बातों से दबना न पड़े। लेकिन धन्यवाद, महोदय। शायद मैं इस दिव्य जीवन का किसी प्रकार उपयोग करूँगी। अभी मुझे नहीं पता। मुझे भौतिक रूप से, भौतिक मन और भौतिक सोच से इस पर विचार करना होगा। या क्या आप कृपा करके मुझे कोई सुझाव देंगे? इसका सर्वोत्तम उपयोग कैसे किया जाए?

“प्रिय सम्राटों के सम्राटों के सम्राटों के सम्राट, यह लंबे समय तक जीने की कोई बाध्यता नहीं, बल्कि एक अधिकार और विशेषाधिकार है, जिससे आप अपनी पसंद के किसी भी ग्रह पर, कहीं भी निवास करते हुए सदा जीवित रहने का दर्जा पा सकती हैं। या आप इसका उपयोग न करने का विकल्प चुन सकती हैं, फिर भी पूरे ब्रह्मांड में आपको ऐसे विशिष्ट व्यक्ति के रूप में सम्मान मिलेगा, जिसके पास दिव्य जीवनशैली में सदा जीवित रहने की उपाधि और शक्ति का विशेषाधिकार है।” फ़ो के महामहिम बुद्ध सम्राट, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। बहुत-बहुत धन्यवाद। क्षमा कीजिए, आज मेरी आवाज़ ठीक नहीं है—तनाव बहुत अधिक है। इस भौतिक जगत में मेरे काम में बहुत तनाव है। यह आपके लोक जैसा शांत और आनंदमय नहीं है।

शिक्षा के उद्देश्य से, क्या आप कृपया विस्तार से बता सकते हैं कि दिव्य जीवन का अधिकार रखने वाले प्राणी को किस प्रकार के विशेषाधिकार, शक्ति और दर्जा प्राप्त होता है? यदि हमें यह बताना संभव हो। धन्यवाद। “दिव्य जीवन वाले प्राणी के पास अनगिनत विशेषाधिकार, शक्तियाँ और क्षमताएँ होती हैं। वे इतनी अधिक हैं कि उनकी सूची बनाना भी संभव नहीं।” क्या उनमें से कुछ मुख्य बातें बताना संभव है? “ओह, हाँ, अवश्य। स्पष्टतः सबसे प्रमुख बात यह है कि आप दिव्य दर्जे, विशेषाधिकार, सुख-सुविधा और शक्ति के साथ सदा जीवित रह सकती हैं, और अपनी आवश्यकता या इच्छा की हर वस्तु स्वतंत्र रूप से पा सकती हैं।”

जी, महोदय। लेकिन मेरे मामले में, मुझे नहीं पता कि इससे उस समस्त कर्म-भार से मुक्ति मिल सकती है या नहीं, जिसे इस ग्रह के प्राणियों की सहायता के लिए मुझ विनम्र प्राणी को उठाना पड़ता है। “ओह, हाँ, हाँ। यह बात हम समझते हैं। और आपके समस्त दुख तथा पीड़ा, जिन्हें आपको सहना पड़ता है, उनके लिए हमें खेद है।” कोई बात नहीं, महोदय। यह सहनीय है, सहनीय है। और इससे दूसरों की सहायता होती है, इसलिए एक तरह से यह सार्थक है। लेकिन आपका उपहार इतना बड़ा विशेषाधिकार है कि उसने मुझे अत्यंत भावविभोर कर दिया है। मैं हृदय से आपका धन्यवाद करती हूँ। परमेश्वर आपको और आपकी प्रजा को सर्वश्रेष्ठ वरदान प्रदान करें। भले ही इस ग्रह के सभी मनुष्यों के लिए आपके पास कोई उपहार न हो, फिर भी इतनी दूर के लोक से यहाँ आने और अपने आप इस ग्रह के जीवन के लिए आशीष तथा उन्नतिकारी शक्ति लाने हेतु हम हृदय से आपका धन्यवाद करते हैं। हम सचमुच आपका धन्यवाद करते हैं। परमेश्वर आपको और अधिक आशीष दें।

“हाँ, हमें भी खेद है, लेकिन इस संसार के मनुष्यों और प्राणियों से हमारा उतना गहरा संबंध नहीं है, जितना कुछ अन्य बुद्ध सम्राटों का है।” कोई बात नहीं, महामहिम। सभी बुद्ध सम्राटों पर यह दायित्व नहीं है कि वे आकर किसी प्रकार इस ग्रह की सहायता करें, क्योंकि सबके कर्म और आत्मीय संबंध अलग-अलग हैं। फिर भी हमारे पास आने, शांति का समर्थन करते रहने, इस ग्रह के वातावरण को उन्नत करने और इस संसार के प्राणियों की सहायता व कल्याण के लिए हमारे साथ कार्य करने हेतु हम आपका धन्यवाद करते हैं। हम आपका बहुत-बहुत-बहुत धन्यवाद करते हैं। आप चुपचाप भी हमारी सहायता करते रहे हैं, और अब शांति की उपलब्धि- तथा अभी जारी- कुछ प्रगतियों की प्रसन्नता हमारे साथ बाँटने के लिए इतनी दूर से आए हैं। हम सचमुच आपसे प्रेम करते हैं और आपका धन्यवाद करते हैं।

मैं भौतिक संसार में हूँ और आपके साम्राज्य से बहुत दूर हूँ, लेकिन क्या किसी भी प्रकार आपसे संपर्क या जुड़ाव संभव है? “ओह, हाँ, बिल्कुल संभव है। और यदि कोई आवश्यकता हो तथा हम सहायता कर सकें, तो कृपया हमें बताएँ।” ओह, यह अद्भुत है। यह आपकी अत्यंत दयालुता और उदारता है। इस ग्रह पर आठ दिनों के प्रवास में क्या आपकी कुछ विशेष करने की योजना है? “नहीं, विशेष रूप से नहीं। शायद जाने से पहले स्वाभाविक रूप से अपनी कुछ ऊर्जा और आशीष प्रदान करेंगे।” ओह, यह अद्भुत है। यह आपकी अत्यधिक उदारता है। क्या इससे आपको आध्यात्मिक, या भौतिक, या भावनात्मक या किसी अन्य प्रकार की हानि होगी? “नहीं। यदि ऐसा हुआ भी, तो हम अपने लोक में शीघ्र स्वस्थ हो सकते हैं, जहाँ की ऊर्जा इतनी शुद्ध और ##उपचारकारी है, कि यदि हम पर किसी प्रकार का प्रतिकूल प्रभाव पड़ भी जाए, तो वह हमें स्वाभाविक रूप से स्वस्थ कर देती है।” वाह, यह अच्छा है, बहुत अच्छा। यह अच्छी बात है। यह सुनकर प्रसन्नता हुई। धन्यवाद, महोदय।

क्या आप किसी प्रकार आठ दिनों से अधिक नहीं ठहर सकते? “नहीं, हम नहीं ठहर सकते। पृथ्वी का वातावरण बहुत भारी है और अत्यधिक नकारात्मकता तथा हानिकारक ऊर्जा से भरा है। यदि हम अधिक समय ठहरे, तो वापस नहीं जा पाएँगे। यद्यपि हमारी अपनी शक्ति, विशेष तकनीक और उपकरण हमारी रक्षा कर रहे हैं, फिर भी अधिक समय ठहरने पर ये सब हमें सुरक्षित नहीं रख पाएँगे और हम घर लौटकर अपना पूर्व दर्जा और शक्ति बनाए नहीं रख सकेंगे। इसलिए अनिच्छा से हम आठ दिन रुकेंगे और फिर हमें जाना होगा। लेकिन हम आपसे कभी भी जुड़ और संपर्क कर सकते हैं।”

धन्यवाद, महोदय। आपके सर्वोच्च आध्यात्मिक उपहार के लिए धन्यवाद। मैं अत्यंत भावविभोर हूँ। मुझे अभी विचार करना है कि इसका उपयोग करना है या नहीं और कैसे करना है। यहाँ आने और दूर से आए अन्य बुद्ध सम्राटों के साथ इतनी सहायक तथा आशीषमयी ऊर्जा लाने के लिए, पृथ्वी के सभी प्राणियों की ओर से हम आपका बहुत धन्यवाद करते हैं- बहुत धन्यवाद- बहुत धन्यवाद, बहुत धन्यवाद करते हैं। और मुझे लगता है कि आपके लोक और आपकी प्रजा को अब उससे अधिक किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं होगी, जो आप पहले ही प्राप्त कर चुके हैं। फिर भी यदि कभी कोई आवश्यकता हो, तो कृपया मुझे बताएँ। धन्यवाद। कृपया हमारे यहाँ से जाने से पहले अच्छी तरह विश्राम करके अपनी शक्ति पुनः प्राप्त कर लें। परमेश्वर का आशीर्वाद हर मार्ग पर आपके और आपकी प्रजा के साथ रहे।

Photo Caption: "ईश्वर हर रूप और आकार रचते हैं, इसलिए दुनिया महकती और सुंदर है"

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