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इस एपिसोड में, मास्टर समझाती हैं कि हम सभी परम स्रोत से आए हैं और दीक्षा के समय हमारा आंतरिक ज्ञान जागृत हो जाता है। वह आध्यात्मिक साधना में मदद के लिए वीगन आहार अपनाने की सलाह भी देती हैं, क्योंकि इससे हत्या के कर्म न्यूनतम होते हैं, हमारा शरीर शुद्ध रहता है और इस प्रकार आध्यात्मिक प्रगति तेज़ होती है, और यह सभी प्राणियों के प्रति हमारे प्रेम की अभिव्यक्ति भी है।(तो आप लोगों से अपनी सारी सांसारिक चिज़ें त्यागने को नहीं कह रहीं, बल्कि वे जो भी कर रहे हों, उसमें सच्चा इरादा रखने को कह रही हैं?) सही, सही, सही। हमें आध्यात्मिक जगत के साथ-साथ इस संसार के लिए भी उपयोगी और सहायक बनना चाहिए। हमें हर दृष्टि से विकास करना चाहिए, केवल आध्यात्मिक पक्ष में ही नहीं।(धन्यवाद। क्योंकि हम बहुआयामी हैं, है ना?) हाँ, बहुआयामी। (जी।) क्योंकि हमें दोषहीन होना है, जैसे कहा गया है, “तुम दोषहीन बनो, जैसे स्वर्ग में तुम्हारे परमपिता दोषहीन हैं।” और एक दोषहीन व्यक्ति किसी गुफा में पालथी मारकर निष्क्रिय नहीं बैठ सकता, या न अपना जीवन बदले, या वह काम न करे जो वह कर रहा है। उसे उत्तरदायी भी होना चाहिए।(अच्छ, गुरुवर, फिर एक बार, गुफा में पालथी मारकर बैठने की बात चली है, तो क्या आप थोड़ा विस्तार से बताएँगी कि आप ध्यान की किस शैली या विधि की सलाह देती हैं?) जी। अच्छा, किसी शैली की आवश्यकता नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आपकी आंतरिक प्रज्ञा जागृत हो जाए, और यह कीया जाएगा दीक्षा के समय। हम इसका उपयोग करते हैं, अपनी समझने की क्षमता, इन सब घटनाओं को समझने के लिए जो हमारे आसपास होती हैं, और ब्रह्मांड को समझने के लिए, और स्वयं को समझने के लिए। यह मुद्रा नहीं है जो महत्वपूर्ण है, यह एकाग्रता है।Jared: अच्छ, आपका पुनः स्वागत है। यह रेडियो 2000 का कार्यक्रम ‘सीइंग बियॉन्ड’ है। हमें आशा है कि हम आपके शुक्रवार को आनंदमय बना रहे हैं और रोज़ मिलने वाली उन खबरों जो उतनी सारी पाने के हम आदि हैं, उस के बजाय कुछ अच्छी खबरें दे रहे हैं, मैं कहुंगा, जो उजाले के बजाय अक्सर काले बादल जैसी लगती हैं। और हम आशा करते हैं, कि आज सुबह दक्षिणी कैलिफ़ोर्निया से फ़ोन पर हमसे जुड़ीं सुप्रीम मास्टर चिंग हाई से बातचीत जारी रखते हुए हम आपके जीवन में कुछ धूप और उजाला ला रहे हैं। वह, मैं कहुंगा, एक विस्मयकारी महिला हैं। मुझे नहीं पता कि [उनका] वर्णन और कैसे करूँ। गुरुवर, आपको कुछ बातें समझाने में कठिनाई हुई है। और मुझे आपका वर्णन करने में कठिनाई हो रही है, सिवाय इसके कि मैं वास्तव में प्रसन्न हूँ कि आप नारी रूप में हमारे सामने आई हैं।मेरा मानना है कि आज के संसार में एक शक्तिशाली आध्यात्मिक महिला को सुनना हमारे जीवनों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। बहुत से पुरुषों हर ओर तरह-तरह की बातें कहते आस-पास दौडते हैं, इसलिए मुझे प्रसन्नता है कि आज सुबह आप यहाँ हैं।Master: धन्यवाद। मैं भी प्रसन्न हूँ। मैं प्रसन्न हूँ कि आपने मुझे यह सम्मान और अवसर दिया।गुरुवर, आपने कई बार “दीक्षा” शब्द का उल्लेख किया है।) जी। (मैं विस्मित हूँ क्या आप बताएँगी कि इससे आप क्या सुचित करते हैं? मैं इस शब्द का अर्थ जानता हूँ, लेकिन आप इससे वास्तव में क्या कहना चाहती हैं?) जी, जी।वास्तव में दीक्षा आत्मा को जागृत करने की प्रक्रिया का केवल एक शब्द है। देखिए, दृश्य और अदृश्य, कई प्रकार की बाधाओं ने हमें ढक रखा है। तो तथाकथित दीक्षा परमप्रज्ञा का द्वार खोलने की प्रक्रिया है, ताकि वह इस संसार में प्रवाहित होकर संसार और हमारे तथाकथित स्व को, दोनों को आशीष दें। लेकिन सच्चा स्व सदा महिमा और प्रज्ञा में होता है। उसे किसी आशीष की आवश्यकता नहीं होती। मेरा आशय है कि जीस तरह हम वस्तुएं समझते हैं, यह समझ, फिर, आशीष देगी संसार को, जिसमें हम रहते हैं, उसको बनाने के लिए।(तो गुरुवर, क्या आप यह कह रही हैं कि दीक्षा में आप व्यक्ति को आशीष देती हैं और किसी तरह वह उनको नई संभावनाओं के लिए द्वार खोल देता है?) जी। वास्तव में, हम ब्रह्मांड में सर्वोच्च हैं, हम सब। हम सर्वोच्च स्रोत से आए हैं; इसलिए, हम भी सर्वोच्च होगे। हम केवल पेड़ों, पत्थरों या ऐसी किसी वस्तु से नहीं आ सकते, जो हम सोचते हैं। तो, फिर भी, दीक्षा की प्रक्रिया हमें तत्काल झकझोरकर उस सर्वोच्च अवस्था में वापस ले जाती है, जिसे हम रोज़मर्रा के सांसारिक कामों में अत्यधिक व्यस्त रहने के कारण शुरू से ही भूल चुके हैं।मुझे वह पसंद है: "हमें झकझोरकर उस उच्चतर अवस्था में वापस ले जाना।") सर्वोच्च अवस्था। (सर्वोच्च!) जी।Jared: गुरुवर, मैं जानता हूँ कि सूफ़ी गुरुओं प्रायः कहते हैं कि इस जीवन में क्या करने के लिए हम यहाँ है, यह याद करने के लिए कि हम कौन हैं। (सही है।) और यह ऐसा लगता है कि आप भी यही कह रही हैं। (हाँ, हाँ, बिल्कुल यही।) हमारे इस भ्रम से ढके अस्तित्व की बात करें, जो हमारी भ्रांती है, जानता हूँ मैं मेरे एक शिक्षक ने कभी यह कहा था, हाँ, कि यहाँ जीवन का बहुत बड़ा भाग माया या भ्रम है, लेकिन उसने कहा था यह भ्रम भी बहुत वास्तविक है। हम इसमें बुरी तरह बँध जाते हैं। (सही है।) आपके विचार से आध्यात्मिक साधक को अपने मार्ग पर किन सबसे बड़ी बाधाओं का सामना करना पड़ता है?Master: अच्छा, जितना हम अधिक जानते हैं, उतना ही कम हम समझते हैं। (यह मुझे बहुत प्यारा लग।) (क्या आपको लगता है कि यह कोई सकारात्मक दिशा है, शायद?) क्योंकि हम सांसारिक जानाकारी बहुत अधिक संग्रह कर लेते हैं। इसीलिए हम सच्ची प्रज्ञा को नहीं समझ पाते। यही हमारा भ्रम से ढका अस्तित्व है। हमें अपनी पीएचडी या इस सांसारिक जगत से अर्जित ज्ञान पर इतना गर्व होता है कि हम भूल जाते हैं कि हम उससे कहीं महान हैं। वास्तव में, जब हम अत्यधिक गर्वित होते हैं, तो हम स्वयं को छोटा समझ रहे होते हैं, क्योंकि हम उससे कहीं महान हैं। और, निस्संदेह, सांसारिक ज्ञान आध्यात्मिक प्रज्ञा में बाधा नहीं बनता, लेकिन यदि हम... यह निर्भर करता है, यदि हम उससे चिपकते हैं, फिर तो हम मुसीबत में है।(यह ऐसा लगता है आप कह रही हैं कि यदि हम वह ज्ञान को मानते हैं, मस्तिष्क का ज्ञान, कि हम विद्यालयों से पीएचडी लेने के लिए जाते हैं, यदि हम इस से ही ईश्वर बना लें,) सही। (फिर हम सो जाते हैं।) सही। फिर तो आप सब कुछ जानते हैं।(हाँ, शायद अब मैं मुश्किल में हूँ।) (जरेड, मुझे पता है क्यों। क्योंकि अभी आप केवल पीएचडी के उम्मीदवार हैं। यदि आप को पीएचडी मिल चुकी होती, तो आप मुश्किल में होते।) (ओह, सही कहा। हाँ। शायद यही बात है।) अच्छा, उसे हैं? (हाँ।) अच्छा, बधाई। (ठीक, मेरा विचार है कि मैं सदा उम्मीदवार ही हूँ, मुझे नहीं लगता... खैर।) (वह ये बनने की प्रक्रिया में हैं, जो शायद वास्तव में हम सभी हैं।)नहीं, मेरा आशय इन उपाधियों को तुच्छ समझना नहीं है। मेरा मतलब है, केवल स्पष्ट उदाहरण देने के लिए कि यदि हम इन चीज़ों से अत्यधिक चिपक जाएँ, तो अपने सच्चे स्व को भूल जाते हैं, बस इतना ही। (जी, बिल्कुल।)Jared: अच्छा, इससे मुझे बाइबल की वह कथा याद आती है, जिसमें एक धनी युवा शासक यीशु के पास आकर पूछता है, “अनंत जीवन पाने के लिए मुझे क्या करना होगा?” और यीशु ने ठीक उसी वस्तु पर प्रहार किया, जिससे वह आसक्त था। उन्होंने कहा, “तुम्हें सब कुछ त्यागना होगा?” मेरे विचार से वह ऐसा नहीं करना चाहता था। (सही।)बर्कले से फ़ोन करने वाले माइक, जानना चाहते हैं, कोइ गुरु को “सुप्रीम मास्टर” की उपाधि कैसे मिलती है?Master: अच्छा, समझी। अच्छा, मैं भी नहीं जानती कैसे। (आप एक सुबह जागीं और किसी ने आपको यह बता दिया, है ना?) जी, अच्छा या कभी-कभी शिष्यों, तथाकथित शिष्यों, तथाकथित गुरु की ऊच्चता को पहचान लेते हैं। तो वे गुरु को कई आराधना योग्य नामों से पुकारते हैं। उदाहरण के लिए, मसीह भी एक उपाधि है। बुद्ध भी एक उपाधि है (जी।) जो उस समय के गुरुओं को दी गई थी। अच्छा, मैं इतना सर्वोच्च नहीं मानती, पर यह निश्चित रूप से जानती हूँ कि हम सर्वोच्च स्रोत से आए हैं। मैं आपको केवल इतना ही बता सकती हूँ।Jared: हम सर्वोच्च स्रोत से आए हैं। (जी, हम सभी।) जी। (जी।) वह अपने आप में एक ध्यान है, है ना? इसे बार-बार दोहराते रहना। “मैं सर्वोच्च स्रोत से आया हूँ।”Master: अच्छा, बात इसे दोहराने की नहीं है; यह बस दृढ़ विश्वास है जो हम जानते हैं आत्म-साक्षात्कार से। (सही।) जी। (बस यही है।)Bonnie: जानते हैं आप, गुरुवर, मैं आपके बारे में यह देख रहा हूँ कि आप के पास बहुत आत्मीय और सौम्य हास्य-बोध है। (ओह, सच में?) जी। हमारे जीवन में हास्य के महत्व पर कुछ बात करीए।Master: अच्छा, वह अपने आप आता है। जब आप चीज़ों को सहजता से देखते हैं और जानते हैं कि आप कहाँ से आए हैं, तो वह अपने आप आता है। और जब आप बहुत आश्वस्त होते हो अपने भीतर में, तब आपमें हास्य-बोध होता है। (ठीक है।) निस्संदेह, उसका स्तर अलग, हो सकता है, लेकिन... (जी।) फिर कोई बात इतनी महत्वपूर्ण नहीं रह जाती। कुछ भी इतना महत्वपूर्ण नहीं कि उसके लिए आपको अपनी सकारात्मक सोच छोड़नी पड़े। (कुछ भी इतना महत्वपूर्ण नहीं कि आपको अपना हास्य-बोध त्यागना पड़े।) जी, सही।(सैन होज़े से, एलेक्स फ़ोन करके पूछते है, “अविवाहित रहने की शिक्षा के बारे में गुरुवर का क्या विचार है?”) (अविवाहित रहना। शायद उनका आशय विवाह न करने और [वीगन आहार] से है।)Master: ठीक है। नहीं, मैं वीगन आहार की सलाह देती हूँ, विवाह न करने की नहीं। क्योंकि हम इस भौतिक जीवन में हैं, और हमसे जो भी मांगा जाए, हमें उसे पूरा करना चाहिए, बशर्ते उनसे किसी अन्य को हानि न पहुँचे। बहुत-से लोगों के लिए वैवाहिक जीवन अच्छा है। मैं यह भी नहीं कहती कि सभी लोगों को विवाह करना चाहिए। वे क्या करना पसंद करते हैं उस पर यह निर्भर करता है। विवाह का अर्थ है एक जीवनभर का साहचर्य और एक अधिक सार्थक जीवन भी है। और यदि हम स्वयं भी आध्यात्मिक हैं, तो इस संसार में और अधिक आध्यात्मिक आत्माओं को लाएँगे। यह बहुत फलदार है। इसमें कोई समस्या नहीं। वीगन आहार सभी प्राणियों के प्रति अपना प्रेम व्यक्त करने का एक माध्यम है।Jared: अच्छा, लिंडा, मेनलो पार्क से फ़ोन कीया है, वह भी [वीगन आहार] का महत्व बताने को कहती है। (जी।) [वीगन] होना क्यों महत्वपूर्ण है?Master: अच्छा, क्योंकि यह इस ग्रह पर जीव-हत्या का भारी कर्म कम देगा। "कर्म" का अर्थ हमारे कार्यों का परिणाम है। तो यदि हमारे कर्म, वाणी, शरीर और मन शुद्ध तरह के होंगे- तो यह ग्रह भी अधिक शुद्ध और अधिक शांतिपूर्ण हो जाएगा। और निस्संदेह, इसका प्रभाव सभी पर पड़ता है, सबसे पहले स्वयं हम पर।(गुरुवर, किसी व्यक्ति का आहार उसकी आध्यात्मिक प्रगति को किस प्रकार प्रभावित करता है?) देखिए, शरीर और मन भी हमारी आध्यात्मिक प्रगति को प्रभावित करते हैं, क्योंकि उच्चतर अवस्थाओं तक पहुँचने के लिए हमें इस शरीर और मन के इन साधनों का उपयोग करना पड़ता है। है ना? (जी।) इसलिए, इनका शुद्ध होना चाहिए। उदाहरण के लिए, यदि आप पीने के लिए गिलास में पानी भरते हैं, तो गिलास स्वच्छ होना चाहिए। वरना, कभी-कभी वह आपको विषाक्त कर सकता है। दोष पानी का नहीं होता, लेकिन आप पानी गिलास से पीते हैं, इसलिए गिलास स्वच्छ होना चाहिए।(गुरुवर, क्या इस समय ताइवान (फ़ॉर्मोसा) को ही आप अपना मुख्य निवास मानती हैं?) जी। (मैं जानना चाहता हूँ कि मुख्यभूमि चीन से आपका किस प्रकार का संबंध है या रहा है?) अनुरोध मिलने पर हम वहाँ भी लोगों को दीक्षा देने भेजते हैं। हज़ारों, हज़ारों लोगों को दीक्षा दी गइ हैं। हाँ।(तो, क्या आपको लगता है कि... इससे तो मुख्यभूमि चीन की ग्रहणशीलता में बड़ा बदलाव दिखाई देता है?) हाँ, हाँ। (क्या वहाँ बहुत परिवर्तन हो रहा है?) जी हाँ, बहुत परिवर्तन हो रहा है, हाँ, और बेहतरी की ओर, हाँ। (रूस के बारे में क्या? क्या आप रूस गई हैं?) जी, गई हूँ। बहुत समय पहले, एक दिन वहाँ से केवल गुज़री थी। (केवल गुज़री थीं।) जी। लौह परदा हटने से पहले।(गुरुवर, अगले विराम लेने से पहले हमारे पास केवल दो मिनट हैं। आप यीशु और बुद्ध, दोनों के बारे में बहुत श्रद्धा से बोलती हैं और उनकी शिक्षाओं के बीच समानताएँ देखती हैं। मैं जानता हूँ, जहाँ तक ईसाई लोग मानते हैं, मेरा मानना है, कि यीशु ईश्वर हैं, और मैं जानता हूँ कि बौद्ध लोग बुद्ध को ठीक उसी रूप में नहीं देखते। क्या आप उसके बारे में बताएँगी, आपके अनुसार वे किस तरह समान और किस तरह भिन्न हैं?) ठीक है।देखिए, बौद्ध मतावलंबी भी कुछ इसी प्रकार सोचते हैं। मेरा आशय, एक दृष्टि से सच्चे बौद्ध लोगों से है। क्योंकि भारत में गुरु को ईश्वर माना जाता है, और प्रभु यीशु तथा बुद्ध ऐसे ही गुरुओं थें, और वास्तव में कभी-कभी वे लोग गुरुओं को ईश्वर से भी अधिक पूजते हैं, क्योंकि वे कहते हैं, कि ईश्वर ने तो हमें इस पीडामय अस्तित्व में डाल दिया, लेकिन गुरु विपत्ति की शृंखला को काट काटकर हमें मुक्त कर देते हैं। लेकिन अनुवाद और गलत व्याख्या कभी-कभी हमारे लिए बहुत भ्रम पैदा कर देते हैं; पर मूल तत्व तक पहुँचने के लिए मैं इन सबके पार देखती हूँ। यह परिणाम है आत्मज्ञान का।(गुरुवर, अब हम एक बार फिर छोटा-सा विराम लेंगे) जी। (ताकि रेडियो 2000 के कार्यक्रम ‘सीइंग बियॉन्ड’ के कुछ प्रायोजकों का स्वागत कर सकें। इस छोटे-से विराम के बाद हम आप सभी के पास लौटेंगे।)Photo Caption: "फूल खिलते हैं मूल स्रोत्र के लिए आत्मा महिमा गाती है उस एकमात्र की"











