विवरण
डाउनलोड Docx
और पढो
दूर से हवा अब भी आती है अनवरत वर्षा अब भी उदासी फैलाती है स्वर्ग में न्गाउ दिव्य युगल और कितने वर्षों तक पतझड़ के कारण आँसू बहाता रहेगा?
प्रेम सुख-दुख, स्नेह की ऊष्मा और धुँधली पड़ती भावनाओं का अनंत मुखड़ा है, ठीक प्रकृति के बदलावों और आती-जाती चार ऋतुओं की तरह। अंततः सब कुछ बीते समय की कहानी बन जाता है। प्रेम-संबंध भी इस शाश्वत नियम से बच नहीं सकते।पतझड़ को जाते देख धूप में दुख उमड़ता है और खिड़की के बाहर पत्ते बिखरते हैं अपना नाम गुमनामी में खोते सुनती हूँ जब सुनहरे पतझड़ में महीने और दिन मिटते जाते हैं...पतझड़ की विदाई के वे पल देखते हुए, खाली बाँहें पछतावे को भरती हैं रात में ठंडी हवा सुनते हुए, तीस पार की उम्र में आँखें उदासी से भर जाती हैं किसी से प्रेम करके फिर अकेले ही ठंड का एहसास होता है।पतझड़ की शीतल बयार लौट आई है बैंगनी साँझ से भीगे हैं फुटपाथ और बयार ने लंबी लटों को चूमा, फिर पतझड़ उड़ गया।आज ढलती दोपहर की सुनहरी धूप में दुख उमड़ता है सप्ताहांत का आकाश बादलों से रंगा है मेरी सूनी बाँहें वह राह भूल चुकी हैं जहाँ ठहरी हुई कोमल धूप में तुम्हें घर छोड़ने जाता था।कितने ही पतझड़ आए और चले गए आज ढलती दोपहर धूप से नहाए उद्यान के पास से गुज़रते हुए हमारा बहुत पुराना प्रेम-वृत्तांत उदास पतझड़ी साँझों में अंकित है और इस पतझड़, हमारा सपना मुरझा गया।समय बीतने के साथ समस्त सौंदर्य और यौवन ढल जाता है। किसी दिन दर्पण में बालों की कुछ सफेद लटें देखकर हमें अचानक भौतिक अस्तित्व की नश्वरता का बोध होता है। तब हम किसी शाश्वत सत्य की खोज करने लगते हैं और अपने वास्तविक स्वरूप को पाने की आध्यात्मिक यात्रा पर निकल पड़ते हैं।आज दर्पण में देखा बालों की कुछ लटें सफेद हो रही हैं हाय, जीवन का शीत आ पहुँचा वसंत एक पल और क्यों न ठहरा! पास के उपवन में, बच्चे खेल रहे हैं चौंककर मैं उधर देखती हूँ छोटी-सी कोठरी अब भी शांत है पर वसंत का प्रकाश चुपचाप धूमिल हो रहा है। हे पथिक! हे पथिक! हे पथिक, क्या तुम्हें इस उदासी का आभास नहीं? लगता है, तुम बड़ी जल्दी में हो थोड़ा-सा सामान लिए एकाकी परछाईं पुल के पार बहती जाती है। मंदिर की घंटियाँ तेज़ी से बज रही हैं दूर क्षितिज पर, वर्षा शीघ्र आ रही है व्याकुल होकर पथिक पूछता है: क्या मैंने अभी तक अपने वास्तविक स्वरूप को जाना है?पतझड़ कवियों की ऋतु है, क्योंकि इसके बादल मनमोहक, धूप सुनहरी और भाव गहरे होते हैं। पर जब पतझड़ की सुंदरता उदासी से घिर जाती है, तो न केवल आकाश धूमिल होता है, बल्कि आसपास का दृश्य भी विषाद में डूब जाता है। मानो बिछुड़े लोगों से सहानुभूति जताते हुए पतझड़ की वर्षा की हर कोमल बूँद निरंतर गिरती रहती है।बरामदे में, पतझड़ की वर्षा धीरे-धीरे बरस रही है उदास आकाश शांत है, सूने बादल ठहर गए हैं पतझड़ की वर्षा में अस्पष्ट बहती हवा को सुनते हुए कौन सिसक रहा है, कौन विलाप कर रहा है!डाली पर कुछ नन्हे पक्षी चहकते हैं, मानो नीले आकाश से कह रहे हों: जीवन के लिए कौन सिसक रहा है? आँसू वेग से बहते हैं संसार अपार दुख में डूबा है।आशा है बादल छँटेंगे और शीतल मंद बयार लौटेगी बादल खुलेंगे और नीला आकाश दिखेगा शायद ऐसा सुख है ही नहीं वर्षा अब भी बरस रही है यह उदासी और कितने जन्मों बाद मिटेगी?दूर से हवा अब भी आती है अनवरत वर्षा अब भी उदासी फैलाती है स्वर्ग में न्गाउ दिव्य युगल और कितने वर्षों तक पतझड़ के कारण आँसू बहाता रहेगा?सच्ची शांति और आनंद का एक स्रोत है, जिसे पा लेने पर हमारी सारी सांसारिक संपत्ति अचानक फीकी पड़ जाती है। तब हमारा प्रेम और आनंद विस्तृत होता जाता है और हम उसे सबके साथ बाँटना चाहते हैं।मित्रता के द्वार खुले हैं भीतर आइए और यहाँ मिलने वाली शांति और प्रेम को साझा कीजिएआनंद बाँटिए सूर्य को आपको सांत्वना देने दीजिए विदा का समय आने पर शायद आप जाना ही न चाहें आनंद बाँटिए पर्वत उठते हैं, पर्वत गिरते हैं अब आपको कुछ सिद्ध नहीं करना, आप सब पर चढ़ चुके हैं अब आप यहाँ हैंआप जो भी मधुर गीत सुनेंगे, वे हम सबको प्रिय हैं साथ ही हमारे पास जो सबसे भव्य वस्तुएँ हैं, उनका मोल हमारे लिए कम है कितनी ही छोटी चीज़ें सुख दे सकती हैं प्रेम हर वस्तु में हैआनंद बाँटिए सूर्य को आपको सांत्वना देने दीजिए विदा का समय आने पर शायद आप जाना ही न चाहें आनंद बाँटिए पर्वत उठते हैं, पर्वत गिरते हैं अब आपको कुछ सिद्ध नहीं करना, आप सब पर चढ़ चुके हैं अब आप यहाँ हैं आप यहीं रहें और आनंद बाँटें










